Sunday, October 11, 2009

सर्व धर्म समन्वित राष्ट्र ही असली भारत का स्वरुप :चंद्र्सागर

सर्व धर्म समन्वित राष्ट्र ही असली भारत का स्वरुप :
भारत का सार्वभौमिक समभाव स्वरुप ही भारत का असली स्वरुप है / भारत के महान गणराज्य को
धर्म निरपेक्ष राष्ट्र कहना अनुचित होगा, अपितु भारत को सर्व धर्म समन्वित राष्ट्र कहना अधिक
सार्थक होगा / किसी एक वस्तु का निरपेक्ष दुसरे वस्तु का सापेक्ष होता है /
जैसे यदि कहा जाये अमुक व्यक्ति धार्मिक नहीं है तो इसका दो अर्थ हो सकता है : १) या तो वह
अधार्मिक है अथवा २) भले ही वह धार्मिक नहीं है किन्तु अन्य क्षेत्र के सेवा भावः के कारन वह
पूजनीय हो सकता है /
यदि वह धर्म के निरपेक्ष होगा तो अधर्म का सापेक्ष भी हो सकता है / तो क्या अधर्म के
सहारे कोई राष्ट्र अपनी प्रजा का कल्याण कर सकता है ? कदापि नहीं / इसलिए भारत को
धर्म निरपेक्ष न कहकर यदि सर्व धर्म समन्वित राष्ट्र कहा जाये तो अधिक सार्थक हो सकता
है / यहाँ सभी धर्म का समान आदर है / भारत का कोई भी नागरिक धर्म से निरपेक्ष नहीं
रह सकता / यदि निरपेक्ष रहता तो हमारे माननीय प्रधानमंत्री कभी मंदिर, कभी मस्जिद ,
या कभी गुरूद्वारे में जाकर चादर नहीं चडाते / वे स्वयं पगड़ी धारण करके हमें यह सन्देश
देते हैं की मै किसी विशेष धर्म के सापेक्ष हूँ , निरपेक्ष नहीं / कोई भी व्यक्ति धर्म से निरपेक्ष
रह ही नहीं सकता / अपनी धुरी पर पृथ्वी का घूमना उसका अपना धर्म है , जिसके फलस्वरूप
'रात-दिन ' का होना निहित रहता है / यदि पृथ्वी अपने धर्म से निरपेक्ष हो जाये तो क्या
'रात और दिन ' का होना संभव हो पायेगा ? जल अपना धर्म प्यास बुझाना छोड़ सकता है क्या ?
अग्नि अपना धर्म जलाना छोड़ सकती है क्या ?जब प्रकृति भी धर्म के सापेक्ष है तो हम
धर्म से निरपेक्ष कैसे रह सकते हैं ?
आज भी अदालतों में लोग अपनी- अपनी धर्म ग्रंथों पर हाथ रखकर ही सपथ लेते हैं, तो फिर धर्म से
निरपेक्ष कैसा ? इसलिए गर्व से कहो हमारा भारत सर्व धर्म समन्वित राष्ट्र है /सभी धर्मों का
आदर करने वाला एक मात्र महान राष्ट्र / पं चंद्र्सागर , हरिद्वार

Wednesday, September 16, 2009

गाँव में क्रांति :चंद्रसागर

गाँव में क्रांति :
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हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के सुदूर गाँव मंडवाच (गाताधार) जो की नाहन से ९७ किमी
दूर 'संगडाह' तहसील और 'सांगना' डाकघर के अर्न्तगत पड़ता है/
यहाँ के वर्तमान प्रधान हैं श्री सुखराम शर्मा / २० किमी की कच्ची सड़क पार करके
ब्राहमणों के इस गाँव में जब मै पहुंचा तो चारों ओर का हिमाच्छादित वातावरण
देखकर मै गदगद हो उठा / औपचारिक वार्ता के पश्चात् पता चला यहाँ अभी भी घर -घर
में बकरे की बलि दी जाती है और छुआ-छूत अपने चरम पर है /यहाँ तक की पित्र पक्ष्य
में कोई ब्राह्मण किसी के यहाँ भोजन करना भी पसंद नहीं करता /चार भाईओं में एक
पत्नी -प्रथा अभी भी इस गाँव में प्रचलित है /अर्थात चार भाइयों में कोई एक विवाह करेगा
और शेष तीन भी उसे अपनी पत्नी की तरह व्यवहार करेगा /इक्कीसवीं सदीं में इस
प्रचलन से मै हतप्रभ था /
मैंने सोचा , क्या मै यहाँ कोई क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता हूँ ?
घनघोर वर्षा में मै आद्ध्यात्म के प्रति लोगों का रुझान देखकर आश्चर्य चकित था /
मैंने सोचा भागवत कथा में कोई नहीं आएगा किन्तु पूरा पंडाल खचाखच
भरा था / लोग भीगते हुए कथा श्रवण कर रहे थे / कथा के चौथे दिन अर्थात १०-सितम्बर-२००९
को कथा में गाँव की इन सामाजिक बुराईयों को को मिटाने का मुद्दा उठाया /
उसी दिन रात्री में गाँव के प्रधान ने एक सभा का आयोजन किया और किसी घर
में बकरा न काटने का संकल्प लिया गया/ घर-घर में शौचालय बनाने का संकल्प
लिया गया / आपस में ऊँच-नीच का भेद-भावः मिटाते हुए छुया-छूत मिटाने का तत्काल
निर्णय लिया गया और वह भी सर्व-सम्मति से / कन्यायों
को पाठशाला भेजने का निर्णय भी सर्व- सम्मति से लिया गया और
इसके लिए मै उस प्रधान जी का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ /
एक बकरे की हत्या से लगभग प्रत्येक घर में १० हज़ार रुपये का खर्च होता था /
एक सीजन में लगभग ५ बकरे की बली दी जाती थी /इस हिसाब से अब प्रत्येक
परिवार लगभग पचास हज़ार रुपये बचा सकता है /एक नयी क्रांति का सूत्रपात
किया गया / पचास हज़ार रुपये का बचत किया गया तो पांच वर्ष
में ढाई लाख का मूलधन और ब्याज मिलाकर करीब चार लाख का बचत
कर सकते हैं / इतनी राशि उस गाँव के लिए दो कन्याओं के विवाह के लिए
पर्याप्त है /
यहाँ बहुतायत में आलू- मटर और अखरोट की खेती की जाती है/ पहाडी आलू
का मैदानी क्षेत्रों में बिशेष मांग होता है /और इसका यहाँ के किसानों को अच्छा
मूल्य भी प्राप्त होता है /अस्तु ! ऐसा हर पहाडी गाँव में हो जाए तो विकास की
एक नयी गाथा लिख सकते हैं /
भागवत के अंतिम दिन नाहन से पधारे प्रख्यात योगाचार्य पं श्री देवी सहाय शास्त्री
ने अंतर्राष्ट्रीय ब्राह्मण सभा का सम्मलेन किया जिसमे गाँव में योग भवन बनाने
का निर्णय लिया गया , जिनके निर्देश में ग्राम-वासिओं को योग सिखाकर पूर्ण
स्वस्थ बनाने का संकल्प लिया गया / इस पवित्र कार्य के लिए एक ग्रामीण
भक्त पं कंठी राम ने एक बीघा जमीन दान देने का एलान कर दिया /
मै समस्त ग्राम वासियों को साधुवाद देता हूँ/ पं चंद्रसागर

Saturday, September 5, 2009

"सांख्य" शास्त्र की प्रासंगिकता: पं चंद्रसागर

श्रीमद भागवत महापुराण में भगवान कपिल अपनी माता देवहुति को सांख्य -शास्त्र का
उपदेश करते हैं / वस्तुतः एकादश स्कंध में भी भगवान श्रीकृष्ण , उद्धव को
सांख्य- योग का उपदेश करते हैं/ एक ही शास्त्र का अलग- अलग स्थानों पर स्वयं
भगवान के मुख से प्रतिपादन किया गया है / निश्चित रूप से इसकी अपार महिमा है,
तभी तो भगवान दो बार सांख्य -शास्त्र का निरूपण करते हैं /
किन्तु सांख्य -योग है क्या , भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - सांख्य माने तत्त्वों की गणना /
आत्मा वस्तुतः - तत्त्वतः परमात्मा ही है / जैसे घड़ा तत्त्वतः मिट्टी है , मृत्रिका है ,
उसमे घड़े की आकृति गढ़ी गयी है और भिन्न -भिन्न नाम उसके रखे हुए हैं , वैसे
ही आकृति में उपादान रहता है और नाम बाहर से कल्पित किया जाता है /
देखिये , आप अपने को घड़ा समझते हैं या मिट्टी ?
यदि आप अपने को घड़ा समझते हैं तो आपका जन्म हुआ है /
उसमे कहीं काला दाग भी हो सकता है , वह टूट - फूट भी सकता है
और उसमे मदिरा या गंगा - जल भी भरा जा सकता है /
किन्तु यदि आप अपने को घड़ा-बुद्धि या देह बुद्धि न करके मृत्तिका -
बुद्धि कर लें की मै घड़ा नहीं मिट्टी हूँ , तो न मिट्टी का जल हुआ ,
न मिट्टी में शराब या गंगा -जल रक्खा गया ,न पाप हुआ न
पुण्य हुआ , न राग हुआ न द्वेष हुआ , न सुख हुआ न दुःख हुआ /
जब घड़ा था तब भी माटी और जब फूट गया तब भी माटी ,
माटी के सिवाय और कुछ नहीं /
कपिल भगवान कहते हैं ;-
चेतः खल्वस्य बंधाय मुक्तये चात्मनो मतम् (भाग० ३/२५/१५ )
आत्मा के स्वरुप में न बंधन है , न मुक्ति है /
अपने मन में बंधन की जो कल्पना की गयी है वह अविद्यक है /
अपने स्वरुप को न जानने के कारण ही अपने बंधन की कल्पना होती है /
जब तत्त्व का सम्यक विचार हो जाता है तो मुक्ति तो अपने- आप ही
प्राप्त है /
गुणेषु सक्तं बंधाय रतं वा पुंसि मुक्तये (भाग0 ३/२५१५)
आइये तत्वों की गणना करते हैं / एक होता है 'कार्य ' और दूसरा होता है 'कारण'
इन दोनों के मिश्रण को कहते है 'कार्य- कारण '/पंचभूत 'कार्य' के
अर्न्तगत आते है और प्रकृति उसका 'कारण' है /

दृश्य जगत में जितने भी पशु- पक्षी , वृक्षादी व् मनुष्य दिखाई पड़ते हैं
वे सब के सब पंचभूत के कार्य नहीं है अपितु वे स्वयं पंचभूत रूप ही हैं/
पृथ्वी ,वायु, जल, अग्नि, आकाश ये सभी अंतिम कार्य हैं / इनमे जितनी भी
शक्ल - सूरतें बनती हैं वे सब की सब कल्पित हैं/
क्या किसी शारीर से आकाश अलग होता है? शारीर में सांस एक है ,
आयम एक है, जल एक है और पृथ्वी एक है / इसलिए शरीरों के
अलगाव से तत्त्व में किसी प्रकार का अलगाव नहीं होता /
इसिजिये पंचभूत को 'कार्य' बोलते हैं और प्रकृति को उसका कोई कारण
न होने से 'कारण' बोलते हैं/
अब इन दोनों के बीच में जो पञ्च तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) ,
अंहकार और महत्तत्त्व है , ये अपने कारण की दृष्टि से कर्म और कार्य की
दृष्टि से कारण अर्थात -"कार्य-कारण" कहलाते हैं /
इन तीनों तत्त्वों से परे चौथी वस्तु है असंग - साक्षी, शाश्वत- सनातन, चेतन -
आत्मा , जिनसे ये प्रकाशित होते हैं/
इस प्रकार सांख्य की प्रक्रिया से यदि विचार किया जाये की किस प्रकार
प्रकृति से श्रृष्टि उत्पन्न होती है और श्रृष्टि कैसे प्रकृति में मिल जाती है ,
तो संसार की आसक्ति छूट जाती है और सबमे एक ही भगवत तत्त्व नारायण
का दर्शन होने लगता है /तब कैसा राग और कैसा द्वेष , कौन अपना और
कौन पराया / इस प्रकार के ध्यान से संसार की आसक्ति सर्वथा मिट
जाती है / इसी को कहते हैं 'अन्वय-व्यतिरेक' से चिंतन /सबमे प्रकृति
का अन्वय है ,सभी वस्तुयों के बिना भी प्रकृति रहती है और उसमे
सब के सब लीं हो जाते हैं /परन्तु प्रकृति का लोप साधारण दृष्टि
से नहीं होता / इसके लिए योगाभ्यास करना चाहिए / यदि योगाभ्यास
संभव न हो तब भगवान की भक्ति करनी चाहिए /
भक्ति के लिए कपिलदेवजी ने भगवान के स्वरुप का ध्यान करते हुए
कहा :-
संचिन्तयेद भगवतश्चरनार विंदं
वज्रांकुश ध्वजसरोरुह लांछनाढ्यम (भाग०३/२८/२१)
चरणारविन्द से लेकर मुखारविंद पर्यंत और मुखारविंद से
चरणारविन्द पर्यंत भगवान की आकृति का , उनके श्रीविग्रह का
चिंतन करते रहना चाहिए / मन को दौड़ाना चाहिए भगवान के शारीर में /
मन का स्वभाव है भटकना / तो फिर इस मन को बाहर न भटकाकर
धारणा योग के द्वारा भगवान की आकृति में ले आना चाहिए /
ऐसा ध्यान करते-करते मन अपनी मनोरुपता छोड़ देता है और
स्वतः भगवान के विचार में लीन हो जाता है /
मुक्ताश्रयम यर्हि निर्विषयं विरक्तं
निर्वाण म्रिचछति मनः सहसा यथार्चिः (भाग० ३/२८/३५)
जब इस प्रकार मन समस्त भौतिक कल्मष से रहित और विषयों
से विरक्त हो जाता है तो यह दीपक की लौ के समान स्थिर हो जाता है/
जहाँ एक परमात्मा के सिवाय और कुछ नहीं होता /
ब्रम्ह्सूत्र में भी इसका प्रतिपादन किया गया है -
"पटवच्च" (२/१/१९)
वस्त्र बनने से पहले वह सूत्र में अप्रकट रहता है किन्तु बुनने के बाद
वह बस्त्र के रूप में प्रकट हो जाता है / दोनों ही स्थिति में वस्त्र
अपने कारण में विद्यमान है और उससे अभिन्न भी है /
इसी प्रकार यह जगत् उत्पत्ति से पहले भी ब्रम्ह में स्थित है
और उत्पन्न होने के बाद भी उससे पृथक नहीं होता /
सिया राममय सब जग जानी /
करहु प्रणाम जोरी जुग पानी //

Monday, August 31, 2009

तुलसी शालिग्राम विवाह महिमा :पं चंद्रसागर

तुलसी शालिग्राम विवाह महिमा :पं चंद्रसागर
संपूर्ण विश्वों में जिस देवी की कोई तुलना नहीं है, अतः तुलसी नाम से विख्यात विष्णुप्रिया
अपनी अनंत महिमा के लिए शाश्त्रों में पूजित हैं कार्तिक पूर्णिमा तिथि को तुलसी का
मंगलमय प्राकट्य हुआ था, इसी दिन भगवान श्री हरि ने उनकी पूजा सम्पन्न की थी
श्रीमद देवी भागवत के अनुसार जो व्यक्ति कार्तिक महीने में भगवान विष्णु को तुलसी
पत्र अर्पण करता है , वह दस हज़ार गायों के दान का फल निश्चित रूप से प्राप्त करता
है (देवी भा ९-२५-३६)
तुलसी के प्रादुर्भाव का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है राजा धर्मध्वज की पत्नी माधवी के
गर्भ से एक अतुलनीय अनुपम सौंदर्य वाली कन्या का जन्म हुआ जिसे विद्वान लोग
तुलसी के नाम से पुकारते हैं तुलसी ने बदरीवन में दिव्या एक लाख वर्ष तक तप
किया और ब्रह्मा जी से निवेदन किया, हे तात ! में पूर्व जन्म में गोलोक में श्री कृष्ण
की सहचरी तुलसी नाम की गोपी थी एक दिन रासमंडल में रास की अधिष्ठात्री देवी
श्री राधा ने मुझे श्री कृष्ण के साथ विहार करते हुए देखकर शाप दे दिया -" तुम मनुष्य
योनी प्राप्त करो "
तब गोविन्द ने मुझसे कहा - भारत वर्ष में जन्म लेकर तपस्या करके तुम ब्रम्हा जी के
वरदान से मेरे अंश स्वरुप चतुर्भुज विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करोगी अतः आप मुझे
श्री हरि को पति रूप में प्राप्त करने का वर दीजिये
ब्रह्माजी ने कहा -देवी उसी गोलोक में एक सुदामा नाम का गोप था जो तुम पर आसक्त था
तुम्हारे प्रति कामासक्त भावना के कारन राधा के शाप से वह सुदामा गोप इस समय समुद्र
में शंखचूड नामक दैत्य के रूप में विख्यात है हे देवी ! अब इस जन्म में तुम उसी सुदामा
गोप की पत्नी बनोगी और बाद में शान्तस्वरूप भगवान नारायण का वरण करोगी
दैव योग से उन्ही भगवन नारायण की शाप से तुम अपनी कला से विश्व को पवित्र करने
वाली पावन वृक्ष रूप में प्रतिष्ठित होयोगी तुम्हारे विना की गयी सभी देवतायों की
पूजा व्यर्थ समझी जायेगी वृन्दाबन में तुम "वृन्दावनी " नाम से विख्यात रहोगी
तदन्तर दानव शंखचूड ने गान्धर्व -विवाह के अनुसार उस तुलसी को पत्नी रूप में
ग्रहण कर लिया शंखचूड के आतंक से भयभीत देवगन भगवान विष्णु के पास गए

भगवान विष्णु ने कहा - " जिस समय उसकी पत्नी का सतित्व नष्ट होगा ,
उसी समय उसकी मृत्यु होगी भगवान शंकर स्वयं मेरे त्रिशूल से उसका वध करेंगे "
तदन्तर देवताओं का कार्य सिद्ध्य करने में सदा तत्पर रहने वाले भगवान श्री हरी वैष्णवी माया के द्वारा शंखचूड का रूप धारण कर उसकी पत्नी का पातिव्रत धर्म नष्ट करके शंखचूड को मारने की इच्छा से तुलसी के घर चले गए हास – परिहास
करते हुए जब तुलसी के साथ रमण करने लगे तो तुलसी ने अपने मन में विचार
करके सब कुछ जान लिया और कहा - तुमने छल पूर्वक मेरा सतीत्व नष्ट किया ,
अतः मै तुम्हे शाप देती हूँ -
आपने छल पूर्वक मेरा धर्म नष्ट करके मेरे स्वामी को मार डाला आप पाषाण -ह्रदय वाले
हैं तथा दयाहीन हो गए हैं अतः हे देव ! आप इसी समय पृथ्वी लोक में पाषाण रूप
हो जाएँ
इस पर श्री हरि ने कहा - हे देवी ! तुमने भी मुझे पति रूप में प्राप्त करने हेतु कठोर
तप किया है , अतः इस शरीर का त्याग करके दिव्य देह धारण करके मेरे साथ मेरे
ह्रदय में लक्ष्मी में रूप में स्थापित हो जाओ तुम्हारा यह शरीर गण्डकी नदी के रूप
में प्रसिद्ध होगा
तुमारा केश समूह पुण्य वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित होगा तुम्हारे केश से उत्पन्न
वह वृक्ष " तुलसी " के नाम से प्रसिद्ध होगा ( देवी भाग ९-२४-३२)
मै भी तुम्हारे शाप से पाषाण बनकर भारत वर्ष में गण्डकी नदी के तट के समीप निवास
करूँगा वहां रहने वाले करोंडों कीट अपने तीक्ष्ण दान्तरुपी श्रेष्ठ आयुधों से काट - काटकर
उस शिला के गड्ढे में मेरे चक्र का चिह्न बनायेंगे
जिसमे एक द्वार का चिह्न होगा, चार चक्र होंगे और जो वनमाला से विभूषित होगा तुलसी
वह नविन के मेघ के समान वर्ण वाला पाषण "लक्ष्मी- नारायण " नाम से प्रसिद्द
होगा
जो फल दस हज़ार गायों का दान करने से होता है , वही फल कार्तिक मास में
तुलसी के पत्र के दान से प्राप्त हो जाता है (देवी भाग ९-२४-४१)
जो मनुष्य तुलसी -काष्ठ से निर्मित माला को धारण करता है, पद-पद पर
अश्वमेध यज्ञ का फल निश्चय ही प्राप्त करता है(देवी भाग९-२४-४५)
तुलसी धारण करने से सम्बंधित कुछ विधि -निषेध का पालन भी
अत्यावश्यक है शास्त्रानुसार -पूर्णिमा, अमावश्या , द्वादशी , सूर्य संक्रांति, रात्रि
दोनों संध्याएँ , अशौच ,तथा अपवित्र समयों में, रात के कपड़े पहने
हुए तथा शरीर में तेल लगाकर जो लोग तुलसी के पत्र तोड़ते हैं ,
वे साक्षात् श्री हरि का मस्तक ही काटते हैं (देवी भाग ९-२४-५०)\
शालग्राम शिला का एक नाम "दामोदर" भी है जो पाषाण गोलाकार तथा दो
चक्रों से सुशोभित हैं उसे "दामोदर" स्वरुप जानना चाहिए (देवी भाग ९-२४-६३)
इसलिए कार्तिक मास में दामोदर परिक्रमा का विशेष माहात्म्य है कार्तिक मास
में परिक्रमा करते हुए जो दामोदर भगवान को तुलसी पत्र अर्पण करता है , वह
समस्त तीर्थों का फल प्राप्त कर लेता है
चरों वेदों के पढने तथा तपस्या करने से जो पुण्य प्राप्त होता है , वह पुण्य शालग्राम
के दामोदर स्वरुप पूजन से प्राप्त हो जाता है
तुलसी के आठ पवित्र नामों का स्मरण करने से समस्त पाप क्षीण हो जाते हैं
ये नाम इस प्रकार है - वृंदा, वृन्दबानी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा , नंदनी ,
तुलसी तथा कृष्णजीवनी
तुलसी -शालग्राम विवाह उत्सव मानाने से स्त्रियों को कभी वैधव्य का सामना नहीं
करना पड़ता , यह जीवन के समस्त अमंगलों को समाप्त करके अभीष्ट की
प्राप्ति करा देता है और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करके हरि की शरणागति
प्रदान करा देता है
तुलसी जी की अनंत महिमा का वर्णन कौन कर सकता है
तुलसी के औषधीय गुणों का वर्णन तो आयुर्वेद में विस्तार से किया गया
है सर्दी हो ,जुकाम हो अथवा खांसी हो , तुलसी का रस अमृत -तुल्य
होता है
लगभग २० वर्ष पहले भोपाल में गैस रिसाव काण्ड हुआ था जिसमे हजारों
लोग मारे गए थे एक अमेरिकी रिसर्च टीम ने शोध में पाया - जिन घरों के
आँगन में तुलसी का कुंडा था, उन घरों में किसी की मृत्यु नहीं हुयी थी
तुलसी से उत्सर्जित ऑक्सिजन में तो छूत के रोगाणु व कीटाणु तत्काल नष्ट
हो जाते हैं और संपूर्ण वातावरण पवित्रमय हो जाता है चंद्रसागर , २९-०८-०९


Tuesday, May 19, 2009

दंभ लोभ और अशिष्टता ही 'भाजपा ' के पतन का कारण :

१ )लोकतंत्र में लोकमत ही सर्वोपरि होता है .ऐसे में चुनाव से पूर्व ही अपने
को पि ऍम इन वेटिंग कहना अति दंभ का परिचायक है.
2) सन् 2004 में समय से छह माह पूर्व ही चुनाव कराकर भाजपा
ने अति लोभी और सत्ता लोलुप होने का परिचय दे दिया था .
उस समय विधान सभा के चुनाव में तीन प्रदेशों (राजस्थान , मध्य प्रदेश , गुजरात )
में बहुमत पाकर भाजपा अति लालच में डूब गया और
अपना छह माह का शासन भी हाथ से गवां बैठा ,
3) इस चुनाव में तो मानों भाजपा के बड़े नेताओं ने शपथ ले लिया हो की हम अशिष्ट
और अभद्र भाषा का ही प्रयोग करेंगे : जबकि कांग्रेस का कोई भी बड़े नेता ने पलट कर जबाब भी नहीं दिया . कुछ उदाहरण देखिये :- a ) अडवानी कहते हैं - ' प्रधान मंत्री कमजोर हैं ......'
b) नरेंद्र मोदी कहते हैं ;- प्रियंका बुढ़िया है , फिर कहा गुड़िया है '
क) वरुण गाँधी ने तो सारी हदें पार कर दी . हिंदुत्व पर किस भारतवासी को को गर्व
नहीं होता, पर इसके लिए हाथ काटने की धमकी देने की क्या आवश्यकता है ?
4) श्री राम का नाम तो अब भाजपा के मुख से अपशब्द जैसा लगता है ,
भबिष्य में भाजपा को राम , हिंदुत्व और धर्म की राजनीति छोड़कर केवल
विकास , महंगाई और भ्रष्टाचार उन्मूलन जैसे मुद्दों पर राजनीति करनी चाहिए ,
5) शास्त्रों में एक कुशल राजा का लक्षण बताते हुए कहा गया है ;- अ) जिसके राज्य
में कोई भूखा और निर्वस्त्र न रहे . ब) किसी निर्धन के साथ भी अन्याय न हो .
स) कोई प्रजा निराश्रित न रहे अर्थात् सबके सिर पर छत हो .
6) अब हम सब भारत वासी इस नई सरकार से पूछ रहे हैं ;- क्या अब भारत का गरीब
मिट्टी का तेल, गैस , गेहूं , चावल , चीनी सरसों का तेल व घी खरीद पायेगा ?
ये मूलभूत प्राण रक्षक वस्तुयें यदि सस्ती हो जाए तो सबकी दुआएं मिलेंगी .
७) भाजपा पराजय की आत्म -मंथन करें और कांग्रेस विनम्रता
के साथ विजय मुकुट की रक्षा करे .
यही प्रभु से प्रार्थना है . chandrasagar

Wednesday, March 11, 2009

"होली का राष्ट्रीय चिंतन "

भक्ति के रंग में सराबोर होकर भक्ति के बाधक तत्वों को जलाकर नष्ट कर देना ही
होलिका दहन है.
संकट में अथवा किसी भी प्रतिकूल स्थिति में प्रहलाद से "श्री कृष्णः शरणम
ममः " का पाठ और दृढ हो जाता है
एक बार श्रद्धा व विश्वास का आश्रय लेकर यदि नारायण की शरणागति
मिल जाये तो क्रोध व मोह रूपी होलिका हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती .
परमात्मा के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिए शास्त्रानुकूल आचरण
अति आवश्यक है.
प्रातः ब्रम्ह्मूहुर्त में उठना ,सूर्य को अर्घ्य देना , माता -पिता का
चरण स्पर्श करना , संध्या वन्धन करना ये सब हमें प्रभु के निकट
ले जाकर अति आनंद की अनुभूति कराता है.
आनंद प्राप्त करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है .
आनंदहीन व्यक्ति का जीवन नीरस होता है और वह संपन्न होकर भी
दरिद्र कहलाता है .
शास्त्रानुकूल आचरण करने वाले का लक्ष्मी सदैव आदर करती है.
प्रह्लाद को लक्ष्मी ने स्वयं अपने हाथों से भोजन कराया .
जब हिरण्य कशिपू ने प्रहलाद को बंदी बनाया दिया था .
अब आप ही बताइए जब आप पर लक्ष्मी की कृपा होगी तो आप
संपन्न होंगे और जब आप संपन्न होंगे तो समाज संपन्न होगा
और जब समाज संपन्न होगा तो क्या देश संपन्न नहीं होगा . ?

Tuesday, February 10, 2009

दोनों मुस्लिम भाइयों (युसूफ व इरफान ) की जय हो :

दोनों मुस्लिम भाइयों (युसूफ व इरफान ) की जय हो :--------------------------------------------------------------- श्रीलंका को तीन विकेट से मात देने वाले दोनों पठान बंधुओं ने आज सवासौ करोड़ हिंदुस्तानिओं का सर गर्व से ऊँचा कर दिया है जब दोनों पठान बंधू खेल रहे थे तब हम हिंदूओं का दिल भी खुशी से धड़क रहा था तब हम हिंदू - मुस्लिम में भेद-भाव क्यों करते हैं श्रीराम सेना व विश्व हिंदू परिषद् जैसे संगठनों को कट्टर भाषा का त्याग कर प्रेम व सौहार्द की भाषा अपनानी चाहिए
चंद्रसागर